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Thursday, December 15, 2016

राजपूताना समाज मे शादी में सात की जगह चार फेरों की परम्परा पाबू जी राठौड़ भाग 2

राजपूताना समाज मे शादी में सात की जगह चार फेरों की परम्परा  पाबू जी राठौड़ भाग 2
भाद्रपद मास की बरसात सी झूमती हुई एक बारात जा रही थी। उसकी बारात जिसने विवाह पहले ही सूचना दे दी थी कि- ' मेरा सिर तो बिका हुआ है , विधवा बनना है तो विवाह करना !' उसकी बारात जिसने प्रत्युतर दिया था - जिसके शरीर पर रहने वाला सिर उसका नहीं है , वह अमर है।उसकी पत्नी को विधवा नहीं बनना पड़ता। विधवा तो उसको बनना पड़ता है जो पति का साथ छोड़ देती है ।

ढोली दुहे गा रहा था -
धरती तूं संभागणी ,(थारै) इंद्र जेहड़ो भरतार।
पैरण लीला कांचुवा , ओढ़ण मेघ मलार।।
रंग आज आणन्द घणा, आज सुरंगी नेह।
सखी अमिठो गोठ में , दूधे बूठा मह।।

गोरबंद और रमझोलो से झमक झमक करते हुए ऊँटों और घोड़ों वाली वह बारात जा रही थी , सूखे मरुस्थल की मन्दाकिनी प्रवाहित करती हुई , आनंद और मंगल से ठिठोली करती हुई । परन्तु कौन जनता था कि उस सजी सजाई बारात का वह अलबेला दूल्हा एक दिन जन जन के हृदय का पूज्  देवता बनेगा ?

कौन जानता था? कि सेहरे और पाग की कलंगी और तुर्रों से सजे हुए उस दुल्हे के मन में , जरी गोटे से चमचमाते अचकन बागों में छिपे उसके हृदय में भी एक अरमान था -एक प्रतिज्ञा थी - एक जीवन था -एक तडफन थी -एक आग थी -मेरा ज्ञानार्जन ,मेरा विवाह ,मेरा कुटुंब पालन और मेरे जीवन के समस्त व्यापार एक आर्त की पुकार पर बलि होने के लिए है ।

कौन जानता था? कि उस मौर के समान मीठी बोली वाली ,हिरन के समान कातर नयन वाली, वायुरहित स्थान की लौ सी नासिका वाली, नंदन वन के किसी चंपा की लम्बी डाली जैसे हाथों वाली , चक्रव्यूह की लज्जा और सीता के समान शील वाली देव बाला सी, उमरकोट के बगीचों की अप्सरा सी, रूपमती दुल्हिन गठजोड़े के लिए मिलेगी ?

कौन जानता था? कि स्वर्ग के सोंदर्य को लज्जित करने वाला ऐसा आकर्षक विलास भी गोरक्षा की प्रतिज्ञा के समक्ष श्रीविहीन होकर कोने में प्रतीक्षा करता रह जायेगा ?

कौन जानता था? कि शहनाइयों की गमक ,मांगलिक और मधुर आभूषणों की ठुमक , मनुहारों के उल्लास भरे वातावरण की झमक-झमक में जिस समय झीने घूँघट में छिपे अनुपम और सोंदर्य के किनारों से हृदय-समुद्र की उताल तरंगे पछाड़ खाने को प्रस्तुत होगी , उस समय भाग्य का कोई क्रूर हरकारा भरे हुए प्यालों को ठुकरा कर , जीवन की मधुर हाला को आँगन में ही बिखरने को तैयार हो जायेगा ?

कौन जानता था? कि चारणी भी चील का रूप धारण कर याद दिलाने आएगी - ' राही ! विधाता ने तुम्हारे लिए जो मार्ग निश्चित किया था वह तो कोई दूसरा ही मार्ग है। इस लौकिक पुष्प में जिस सोंदर्य की खोज में भंवरे बन कर आये हो वह अलौकिक सोंदर्य यहाँ नहीं है। दुल्हे ! तेरी बारात तो सजकर यहाँ आई है परन्तु तेरे विवाह की तैयारियां कहीं और हो रही है। तू इस स्वागत से आत्मविभोर हो रहा है परन्तु इससे भी अधिक सुन्दर स्वागत की तैयारियों के लिए किसी अन्य स्थान पर दौड़ धूप हो रही है - देखो , गगन की गहराइयों में , स्वर्ग की अप्सरा ए तुम्हारे लिए वर मालाएँ लेकर खड़ी है !'

बाड़मेर के पूर्व सांसद स्व. श्री तनसिंह जी द्वारा लिखित

कौन जनता था? कि विवाह के ढोल-धमाकों में भी कर्तव्य की क्षीण पुकार कोई सुन सकता है।मादकता के सुध बुध खोने वाले प्यालों को होटों से लगाकर भी कोई मतवाला उन्हें फेंक सकता है , वरमाला के सुरम्य पुष्पों को भी सूंघने के पहले ही पैरों तले रोंद सकता है ?

कौन जानता था? कि मिलन का यह अनुपम अवसर उपस्थित होने पर ब्राह्मण कहता ही रहेगा -अभी तो तीन फेरे ही हुए है ,चौथा बाकी है ,उस समय गठजोड़े को छोड़कर सुहागरात की इन्द्रधनुषीय सतरंगी शय्या के लोभ को ठोकर मारकर ,भोग-एश्वर्य के दुर्लभ स्वाति-नक्षत्र के समय युगों का प्यासा चातक पिऊ पिऊ करता हुआ ,प्यास को ही पीकर ,रागरंग के मादक अवसर पर निमंत्रण भरे इशारों की उपेक्षा कर , कंकण डोरों को बिना खोले ही कर्तव्य मार्ग का बटोही मुक्त हो जायेगा ?

और वह चला गया -क्रोधित नारद की वीणा के तार की तरह झनझनाता हुआ ,भागीरथ के हठ की तरह बल खाता हुआ , उत्तेजित भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा के समान कठोर होकर,

कौन जानता था?  कि नारद की वीणा का वह क्रोधित तार स्वरों की उत्तेजना में ही टूट जायेगा ,भागीरथ के बल खाते हट को न झुकने की इतनी कीमत चुकानी पड़ेगी ? भीष्म की प्रतिज्ञा को आलिंगन-बद्ध भोगों को बिना भोगे ही विदा करना पड़ेगा ?

कौन जानता था? कि चांदे और ढेमे के बीच वह शूरमा पाबू संसार में अपने पीछे लड़ने के इतिहास का अनिर्वचनीय उदहारण रखकर ,सितारों की ऊँचाइयों को नीचा दिखाने वाली केशर कालवी पर सुन्दर स्वागत का साक्षत्कार करने के लिए अनंत की गहराइयों में सशरीर ही पहुँच जायेगा और तब दिशाएँ वियोगिनी बनकर ढूढती रह जाएगी ,मानवता विधवा बनकर सिसकती रह जाएगी ?
कौन जानता था? कि जिसने अग्नि की पूरी परिक्रमाएँ ही साथ नहीं दी ,जिसके हथलेवे का हाथ पकड़ने से पहले ही छोड़ दिया गया , जिसके महावर की लगी हुई मेहँदी ने सुखकर अपनी अरुणिमा का परिचय भी नहीं दिया , जिसकी आँखे किसी का रूप देखने से पहले लज्जा के कारण अपने घूँघट को ऊँचा तक नहीं उठा सकी , वही दुल्हन अपने नए ससुराल में उसी वर से दुबारा पाणिग्रहण कराने के लिए हाथ में नारियल लेकर अपने स्वर्गस्थ पति से चिरमिलन के लिए चल देगी ?
वह चली गयी -उमरकोट के राणा सूरजमल की कोख की जीती जागती ज्योति चली गयी ,परम ज्योति से मिलने के लिए ; केशर कालवी चली गई , विस्मृति की कालिमा में खोने के लिए ; लेकिन स्मृति बाकी रह गई ; पाबू की अमर स्मृति जो आज भी कोलू के पास मरुस्थल के टीलों पर आत्मविभोर हो वीणा वादन कर रही है ; राजस्थान का जनगण उसी की स्मृति का कथाओं और गीतों की लोरों में , रावणहत्थों की धुन के साथ पड़ और पड़वारों में पूजन करता है । पड़ लगती है ,रतजगे होते है , पाबू का यशगान होता है - कि पाबू भी एक क्षत्रिय था।
•     ये था बाड़मेर के पूर्व सांसद स्व. श्री तन सिंह द्वारा लिखित पुस्तक " बदलते दृश्य" में राजस्थान के लोक देवता पाबू जी राठौड़ पर आलेख है।
•     केशर कालवी - यह पाबू जी की घोड़ी का नाम था।
•     पाबू जी द्वारा अपने विवाह में फेरों के उपरांत बिना सात फेरे पूरे किये ही बीच में उठकर गोरक्षा के लिए जाने व अपना बलिदान देने के बाद राजस्थान में राजपूत समुदाय में अब भी शादी में चार ही फेरे लिए जाते है।